‘सिस्टम’ डांस का वीडियो वायरल: SDM ने दफ्तर छोड़ मंच पर उड़ाए नोट


रायपुर/गरियाबंद।कहते हैं प्रशासन का काम जनता की सेवा करना और व्यवस्था बनाए रखना होता है, लेकिन गरियाबंद जिले के देवभोग (उरमाल) में प्रशासन के ‘अंग’ कुछ अलग ही लय में थिरकते नजर आए। यहाँ जनसेवा की जगह ‘नृत्य-सेवा’ को प्राथमिकता दी गई। देवभोग के मंच पर जब ओड़िशा से आई नृत्यांगनाओं ने अश्लीलता की मर्यादाएं लांघी, तो वहां मौजूद जिम्मेदार अधिकारी अपनी ‘कुर्सी’ की गरिमा भूलकर ‘ठुमकों’ की ताल में खो गए। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

फाइलें नहीं, ‘ठुमके’ रिकॉर्ड कर रहे थे साहब

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को देखकर ऐसा लगता है कि मैनपुर एसडीएम साहब ‘डिजिटल इंडिया’ को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले रहे थे। वे न केवल अश्लील डांस का आनंद ले रहे थे, बल्कि एक हाथ से मोबाइल पर वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे और दूसरे हाथ से नोटों की बारिश। साहब ने यह साबित कर दिया कि फील्ड ड्यूटी का मतलब सिर्फ ऑफिस में बैठना नहीं, बल्कि नाच-गाने के बीच भी सक्रिय रहना है। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

कानून का ‘मर्यादा’ मर्दन

छह दिनों तक चलने वाले इस ‘सांस्कृतिक महाकुंभ’ (जिसे लोग अश्लीलता का अड्डा कह रहे हैं) को प्रशासन ने बाकायदा अनुमति दी थी। शायद अनुमति पत्र में यह लिखना भूल गए थे कि मनोरंजन की भी एक सीमा होती है। जब रसूखदार पैसे लुटा रहे थे और नृत्यांगनाएं अर्धनग्न होकर नाच रही थीं, तब कानून-व्यवस्था के रक्षक खुद उस व्यवस्था का मजाक उड़ाते हुए ‘सेल्फी मोड’ में व्यस्त थे।आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

कार्रवाई का ‘साइड इफेक्ट’

मामला जब तूल पकड़ने लगा और सोशल मीडिया पर प्रशासन की ‘किरकिरी’ की रीलें बनने लगीं, तब जाकर जिला कलेक्टर भगवान सिंह यूईक की नींद टूटी।

  • एसडीएम साहब ‘अटैच’: तुलसीदास मरकाम साहब को पद से हटाकर कलेक्टोरेट में अटैच कर दिया गया है। अब शायद उन्हें वहां फाइलों में भी वही ‘ताल’ सुनाई देगी।

  • पुलिस पर गाज: दो पुलिसकर्मियों को लाइन अटैच किया गया है, जिन्हें संभवतः ड्यूटी से ज्यादा डांस का एंगल सेट करने में दिलचस्पी थी।

  • जांच समिति: अब अपर कलेक्टर साहब यह जांच करेंगे कि मर्यादा की धज्जियां कैसे उड़ीं। (हालांकि वीडियो सब कुछ चीख-चीख कर कह रहा है)।

जनता का सवाल

लोग पूछ रहे हैं कि जिस प्रशासन के कंधे पर समाज में नैतिकता और अनुशासन बनाए रखने का भार है, अगर वही ‘अश्लीलता’ का मुख्य अतिथि बन जाए, तो आम जनता किससे उम्मीद करे? छत्तीसगढ़ की संस्कृति और मर्यादा को तार-तार करने वाला यह वाकया जिले के प्रशासनिक इतिहास में एक ‘काले ठुमके’ के रूप में याद किया जाएगा।