सावन प्रदोष व्रत: जानें इसका धार्मिक महत्व, लाभ और पूजन विधि

कोरबा / छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस News : सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की भक्ति और साधना का श्रेष्ठ समय माना जाता है। इस दौरान पड़ने वाला प्रदोष व्रत अत्यंत फलदायी और कल्याणकारी होता है। त्रयोदशी तिथि पर रखा जाने वाला यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की असीम कृपा प्राप्त करने का सबसे सुगम माध्यम है। मान्यता है कि प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में भोलेनाथ की विधि-विधान से पूजा करने पर जीवन के सारे कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
क्या होता है सोम प्रदोष व्रत
जब त्रयोदशी तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसे ‘सोम प्रदोष व्रत’ कहा जाता है। चूंकि सोमवार का दिन स्वयं भगवान शिव को समर्पित है, इसलिए सावन के महीने में सोम प्रदोष का संयोग बनना सोने पर सुहागा माना जाता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा कमजोर स्थिति में हो या अशुभ प्रभाव दे रहा हो, तो सोम प्रदोष का व्रत रखना बेहद लाभकारी सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त, यह व्रत संतान प्राप्ति, मानसिक शांति और परिवार में सुख-समृद्धि के लिए विशेष रूप से रखा जाता है।
व्रत और पूजन के मुख्य नियम
प्रातःकाल की शुरुआत: प्रदोष व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और सूर्यदेव को जल अर्पित करने के बाद व्रत का संकल्प लें।
भगवान शिव का अभिषेक: पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से अभिषेक करें।
शिव परिवार का पूजन: शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, अक्षत, आंकड़े के फूल, धूप और दीप अर्पित करें। साथ ही माता पार्वती और संपूर्ण शिव परिवार का पूजन करें।
कथा व आरती: शाम के समय (प्रदोष काल) में प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें, शिव चालीसा पढ़ें और अंत में श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आरती करें।
व्रत का पारण: संध्या पूजन और आरती संपन्न होने के बाद ही सात्विक आहार के साथ अपना उपवास खोलें।


