
झीरम का फैसला आधा-अधूरा न्याय: कांग्रेस ने एनआईए की जांच पर उठाए गंभीर सवाल, कहा- बड़ी साजिश से पर्दा उठाना जरूरी
कोरबा / छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस: छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 23 मई 2013 को हुए बहुचर्चित झीरम नरसंहार मामले में एनआईए (NIA) कोर्ट के फैसले को “आधा-अधूरा न्याय” करार दिया है। कोरबा में पूर्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल ने प्रेस वार्ता में कहा कि कांग्रेस पार्टी का मानना है की इस फैसले से घटना की असली साजिश और पर्दे के पीछे छिपे चेहरों का पर्दाफाश नहीं हो पाया है। कांग्रेस ने एनआईए की जांच प्रक्रिया, बड़े नक्सलियों के नाम हटाने और तत्कालीन राजनीतिक भूमिका को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शुरुआती एफआईआर में शीर्ष नक्सली नेता गणपति (मुप्पल्ला लक्ष्मण राव) और रमन्ना का नाम शामिल था, और 21 मार्च 2014 को इनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी हुआ था। लेकिन बाद में सितंबर 2014 की चार्जशीट से इनके नाम क्यों हटा दिए गए।
झीरम घाटी हमले में शामिल और इनामी कई बड़े नक्सलियों (जैसे चैतू उर्फ श्याम दादा, रूपेश उर्फ मोल्ला, निर्मला उर्फ सुमित्रा, भूपति उर्फ सोनू दादा और सुजाता आदि) ने समय-समय पर पुलिस व सुरक्षा बलों के समक्ष आत्मसमर्पण किया। कांग्रेस का सवाल है कि एनआईए ने इन कुख्यात नक्सलियों से झीरम हमले के संबंध में पूछताछ क्यों नहीं की और उन्हें मुख्य मामलों में संलिप्त क्यों नहीं किया गया?
षड्यंत्र और कड़ियों की अनदेखी
पार्टी ने पूछा है कि परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा क्यों हटाई गई थी, यात्रा का मार्ग किसने और क्यों बदलवाया था, और हमले की योजना असल में किसके द्वारा बनाई गई थी? कांग्रेस का कहना है कि हमले के दौरान घायल और जीवित बचे पीड़ितों के बयान तक दर्ज नहीं किए गए। कई पीड़ित शपथ पत्र के साथ जांच एजेंसी के समक्ष पहुंचे, लेकिन उनके बयानों को शामिल नहीं किया गया। घटना के हफ़्तों बाद भी शहीदों और घायलों के पर्स, फाइलें और मोबाइल ज़ब्त नहीं किए गए थे।
एनआईए ने तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी और एडीजी (नक्साल ऑपरेशन) से कब और क्या पूछताछ की, यह स्पष्ट होना चाहिए।

भाजपा सरकार पर भी साधा निशाना
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि झीरम मामले में भाजपा की भूमिका शुरू से संदिग्ध रही है। जब सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस की एसआईटी (SIT) को जांच के पक्ष में फैसला दिया था, तब भी सरकार ने जांच शुरू नहीं की। कांग्रेस का यह भी आरोप है कि भाजपा नहीं चाहती कि झीरम का सच कभी देश के सामने आए, और आज भी सरकार व एनआईए की कार्यप्रणाली से यह प्रतीत होता है कि बड़े नक्सली नेताओं को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वे अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन जब तक झीरम नरसंहार के असली साजिशकर्ताओं और राजनीतिक षड्यंत्र का खुलासा नहीं होता, तब तक यह न्याय अधूरा माना जाएगा।



